PCOS क्या है: लक्षण, कारण, ज़रूरी जाँचें और इलाज की पूरी गाइड
BAMS (Bachelor of Ayurvedic Medicine & Surgery)

छोटा जवाब: PCOS ओवरी तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे शरीर की हार्मोनल और मेटाबॉलिक गड़बड़ी है, जिसकी जड़ ज़्यादातर मामलों में इंसुलिन रेज़िस्टेंस होती है। बढ़ा हुआ इंसुलिन एंड्रोजन बढ़ाता है और अंडा हर महीने छूटने नहीं देता। इसे जड़ से मिटाने का कोई इलाज नहीं है, पर खानपान, नींद और सही इलाज से लक्षण काफ़ी हद तक ठीक हो जाते हैं।
PCOS का मतलब है ओवरी में गाँठें, सही है ना? यही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है, और इसी वजह से लाखों महिलाएँ ग़लत जगह इलाज ढूँढती रहती हैं।
हाँ, सोनोग्राफ़ी में ओवरी पर बहुत सारे छोटे-छोटे बुलबुले दिखते हैं, और नाम भी इसीलिए पड़ा था: पॉलीसिस्टिक, यानी बहुत सारी सिस्ट।
लेकिन वे सिस्ट हैं ही नहीं। वे अधपके अंडे हैं, जो पककर छूट नहीं पाए और वहीं रुक गए। यह अंतर छोटा नहीं है। अगर आप इसे ओवरी की गाँठ समझेंगी तो आप ओवरी का इलाज ढूँढेंगी। अगर आप इसे वह समझेंगी जो यह असल में है, एक हार्मोनल और मेटाबॉलिक गड़बड़ी, तो आप उस जगह काम करेंगी जहाँ से यह चलती है।
PCOS असल में है क्या
PCOS एक ऐसी स्थिति है जिसमें तीन चीज़ें आपस में उलझी होती हैं: अंडा हर महीने ठीक से नहीं छूटता, शरीर में पुरुष-प्रकार के हार्मोन (एंड्रोजन) सामान्य से ज़्यादा होते हैं, और ज़्यादातर महिलाओं में शरीर पर इंसुलिन का असर कम पड़ता है।
यह भारत में बहुत आम है। हर पाँच में से लगभग एक महिला इससे गुज़रती है, और बहुत सी को पता ही नहीं चलता, क्योंकि लक्षण अलग-अलग लोगों में अलग दिखते हैं। किसी को सिर्फ़ देर से पीरियड आते हैं, किसी को सिर्फ़ मुँहासे और अनचाहे बाल, और किसी को तब पता चलता है जब गर्भधारण में मुश्किल आती है।
नाम PMOS क्यों हो गया
मई 2026 में The Lancet में छपे एक अंतरराष्ट्रीय सहमति-पत्र ने इस स्थिति का नाम बदलकर PMOS कर दिया, यानी Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome. वजह वही है जो ऊपर लिखी है: जिन्हें सिस्ट समझा गया था वे सिस्ट थीं ही नहीं, और पुराना नाम इस बात को छिपा देता था कि यह पूरे शरीर की मेटाबॉलिक स्थिति है।
आपके लिए इसका व्यावहारिक मतलब कुछ भी नहीं बदलता। वही स्थिति, वही जाँचें, वही इलाज, यहाँ तक कि मेडिकल कोड (ICD-10 E28.2) भी वही है। इस लेख में मैं PCOS ही लिखती रहूँगी, क्योंकि आप यही शब्द जानती हैं और यही खोजती हैं।
PCOS और PCOD में क्या फ़र्क़ है
यह सवाल मुझसे हर हफ़्ते पूछा जाता है, और इसका जवाब जितना सोचा जाता है उससे कहीं आसान है।
PCOD (Polycystic Ovarian Disease) आमतौर पर वह स्थिति कही जाती है जिसमें ओवरी में कई अधपके अंडे जमा हो जाते हैं, पर हार्मोन का असंतुलन हल्का रहता है। साइकल थोड़ी गड़बड़ रहती है, पर मेटाबॉलिक गड़बड़ी उतनी गहरी नहीं होती। PCOS उससे आगे की और ज़्यादा पूरी तस्वीर है, जिसमें एंड्रोजन बढ़े हुए होते हैं, इंसुलिन का असर कम होता है, और अंडा छूटना लंबे समय तक रुका रहता है।
सीधे शब्दों में: PCOD ज़्यादा आम और आमतौर पर हल्का होता है, PCOS कम आम और ज़्यादा गहरा। इलाज की दिशा दोनों में एक ही है, खानपान, वज़न, नींद और ज़रूरत पर दवा। इसलिए अगर आपकी रिपोर्ट पर PCOD लिखा है तो घबराइए मत, और अगर PCOS लिखा है तो हार मानिए मत।
PCOS के लक्षण
लक्षण हर महिला में एक जैसे नहीं होते, और यही इसे पकड़ना मुश्किल बनाता है। ये सबसे आम हैं।
| लक्षण | यह कैसे दिखता है | पीछे क्या है |
|---|---|---|
| अनियमित या देर से पीरियड | साइकल 35 दिन से लंबी, साल में 8 से कम पीरियड, या महीनों का अंतर | अंडा हर महीने नहीं छूट रहा |
| चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल | ठुड्डी, ऊपरी होंठ, गर्दन, पेट या छाती पर मोटे काले बाल | बढ़े हुए एंड्रोजन |
| मुँहासे और तैलीय त्वचा | ठुड्डी और जबड़े की रेखा पर ज़िद्दी मुँहासे, जो बीस की उम्र के बाद भी बने रहें | बढ़े हुए एंड्रोजन |
| सिर के बाल पतले होना | माँग चौड़ी होना, चोटी पतली पड़ना | एंड्रोजन का स्कैल्प पर असर |
| वज़न बढ़ना, ख़ासकर कमर पर | वज़न आसानी से बढ़ता है और मुश्किल से घटता है | इंसुलिन का बढ़ा हुआ स्तर |
| गर्दन और बग़ल की त्वचा काली पड़ना | गर्दन के पीछे, बग़ल या जाँघों के बीच मख़मली काली त्वचा | इंसुलिन रेज़िस्टेंस की सीधी निशानी |
| मीठे की तेज़ तलब और खाने के बाद सुस्ती | खाने के एक-दो घंटे बाद फिर भूख या नींद | शुगर और इंसुलिन का उतार-चढ़ाव |
| गर्भधारण में मुश्किल | कोशिश के बावजूद गर्भ न ठहरना | अंडा भरोसे से नहीं छूट रहा |
| मन का उतार-चढ़ाव और थकान | चिड़चिड़ापन, उदासी, नींद के बाद भी थकान | हार्मोन और शुगर का असंतुलन |
ध्यान दीजिए, इनमें से सारे लक्षण होना ज़रूरी नहीं। बहुत सी दुबली-पतली महिलाओं को भी PCOS होता है, जिसे lean PCOS कहते हैं, और उनमें वज़न वाला लक्षण होता ही नहीं। इसलिए "मैं तो मोटी नहीं हूँ, मुझे कैसे हो सकता है" वाली सोच कई बार निदान में देर करवा देती है।
जड़ में क्या है
यह हिस्सा सबसे ज़रूरी है, क्योंकि इलाज इसी समझ पर टिका है।
ज़्यादातर महिलाओं में कहानी इंसुलिन से शुरू होती है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो खाने के बाद शुगर को कोशिकाओं तक पहुँचाता है। जब शरीर पर इंसुलिन का असर कम पड़ने लगता है, तो पैंक्रियास उसकी भरपाई के लिए और ज़्यादा इंसुलिन बनाता है। इसी को इंसुलिन रेज़िस्टेंस (insulin resistance) कहते हैं।
अब गड़बड़ यहाँ होती है: बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को एंड्रोजन बनाने के लिए उकसाता है, और साथ ही उस प्रोटीन को घटा देता है जो ख़ून में एंड्रोजन को बाँधकर निष्क्रिय रखता है। नतीजा यह कि सक्रिय एंड्रोजन दोगुनी तरफ़ से बढ़ जाते हैं। बढ़े हुए एंड्रोजन अंडे को पककर छूटने नहीं देते, इसलिए पीरियड टलता जाता है, और वही एंड्रोजन त्वचा पर मुँहासे और चेहरे पर अनचाहे बाल लाते हैं।
और चक्र यहीं बंद हो जाता है: बढ़ा हुआ इंसुलिन शरीर को चर्बी जमा करने के लिए कहता है, बढ़ी हुई चर्बी इंसुलिन का असर और कम करती है। इसीलिए PCOS में वज़न घटाना मुश्किल लगता है और लोग इसे इच्छाशक्ति की कमी समझ लेते हैं। यह इच्छाशक्ति की समस्या नहीं है।
आयुर्वेद इसे कैसे देखता है
आयुर्वेद में इस तस्वीर को कफ़ और वात के बिगड़ने से जोड़ा जाता है, जिसकी शुरुआत मंद अग्नि से होती है। अग्नि यानी आपकी पाचन शक्ति। जब यह मंद पड़ती है तो भोजन ठीक से पचता नहीं और आम (अधपचा चिपचिपा कचरा) बनता है, जो शरीर के सूक्ष्म रास्तों यानी स्रोतस को जाम कर देता है। हार्मोन का संदेश उन्हीं रास्तों से चलता है।
बढ़ा हुआ कफ़ भारीपन, सुस्ती, वज़न और रुकी हुई साइकल लाता है। बिगड़ा हुआ वात साइकल की चाल अनियमित करता है। इसीलिए आयुर्वेदिक इलाज ओवरी से नहीं, पेट से शुरू होता है, जो पहली बार सुनने में अजीब लगता है और नतीजों में सबसे ज़्यादा दिखता है।
दोनों भाषाएँ एक ही बात कह रही हैं। जिसे आधुनिक जाँच इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहती है, उसे आयुर्वेद मंद अग्नि और आम कहता है, और दोनों का रास्ता खाने की थाली से होकर जाता है।
जाँच कैसे होती है
PCOS की कोई एक जाँच नहीं होती। डॉक्टर तीन में से कम से कम दो चीज़ें देखते हैं: अनियमित या रुका हुआ अंडा छूटना, बढ़े हुए एंड्रोजन (जाँच में या लक्षणों में), और सोनोग्राफ़ी में ओवरी की वह ख़ास तस्वीर। साथ ही थायरॉइड और प्रोलैक्टिन जैसी दूसरी वजहें हटाई जाती हैं, क्योंकि वे भी बिल्कुल यही लक्षण दे सकती हैं।
जो जाँचें आमतौर पर काम आती हैं: TSH (थायरॉइड), प्रोलैक्टिन, टोटल और फ़्री टेस्टोस्टेरोन, LH और FSH, ख़ाली पेट इंसुलिन और शुगर या HOMA-IR, HbA1c, लिपिड प्रोफ़ाइल, विटामिन D, B12, हीमोग्लोबिन और फ़ेरिटिन, और पेल्विक सोनोग्राफ़ी।
एक बात जो मैं ज़ोर देकर कहती हूँ: सिर्फ़ शुगर की जाँच काफ़ी नहीं है। ख़ाली पेट शुगर सालों तक नॉर्मल दिख सकती है क्योंकि शरीर उसे नॉर्मल रखने के लिए चुपचाप ज़्यादा इंसुलिन बनाता रहता है। इसलिए शुगर के साथ इंसुलिन भी देखिए, वरना जड़ रिपोर्ट में छिपी रह जाती है।
इलाज: क्या असल में काम करता है
1. खाना, जो सबसे बड़ा लीवर है
हर खाने में प्रोटीन रखिए, दाल, छोले, राजमा, पनीर, दही, अंडा या मछली, और साथ में फ़ाइबर वाली सब्ज़ी। मैदा, चीनी, मीठे पेय और तला हुआ कम कीजिए। दिन में तीन बार ठीक से खाइए और बीच में लगातार चरना बंद कीजिए, क्योंकि हर बार खाने पर इंसुलिन उठता है। नाश्ता मत छोड़िए। रोज़ एक चम्मच पिसी अलसी और चौथाई से आधा चम्मच दालचीनी जोड़ लीजिए। विस्तार से यहाँ पढ़िए: अनियमित पीरियड्स के घरेलू उपाय।
2. हरकत, ख़ासकर खाने के बाद
रोज़ तीस मिनट तेज़ चाल से टहलना मांसपेशियों को इंसुलिन के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बनाता है, और खाने के बाद टहलने पर यह असर सबसे अच्छा दिखता है। हफ़्ते में दो बार हल्का वज़न उठाना और जोड़ लीजिए, क्योंकि मांसपेशी शुगर की सबसे बड़ी खपत करने वाली जगह है। घंटों की भूखे पेट कड़ी कसरत उल्टा असर करती है।
3. नींद और तनाव
सात से आठ घंटे। एक रात की ख़राब नींद अगले दिन इंसुलिन की संवेदनशीलता घटा देती है, यह मापा जा चुका है। लगातार तनाव कॉर्टिसोल बढ़ाता है, जो इंसुलिन की गड़बड़ी और अंडा छूटने की देरी दोनों बढ़ाता है। दिन में दस मिनट का शांत साँस-अभ्यास इस स्थिति में इलाज का हिस्सा है, कोई अतिरिक्त शौक़ नहीं।
4. आयुर्वेदिक इलाज
पहले अग्नि सुधारना और आम कम करना, फिर वात शांत करना, और उसके बाद जड़ी-बूटियाँ। दालचीनी, मेथी, अश्वगंधा, शतावरी, अशोक और त्रिफला सबका अपना काम है, और सबका सबके लिए होना ज़रूरी नहीं। पूरा तरीक़ा यहाँ है: अनियमित पीरियड्स का आयुर्वेदिक इलाज।
5. डॉक्टर की दवा, जहाँ ज़रूरत हो
कुछ स्थितियों में दवा सही और ज़रूरी होती है: इंसुलिन पर काम करने वाली दवाएँ, अंडा छुड़वाने वाली दवाएँ जब गर्भधारण की कोशिश हो, एंड्रोजन घटाने वाली दवाएँ, या साइकल संभालने के लिए हार्मोनल गोली। ये सब डॉक्टर की देखरेख में, आपकी रिपोर्ट और आपके लक्ष्य देखकर तय होती हैं। आयुर्वेदिक इलाज इनके साथ चल सकता है, बस दोनों डॉक्टरों को पूरी सूची पता होनी चाहिए, और अपने आप कोई दवा बंद मत कीजिए।
PCOS और गर्भधारण
यह वह डर है जो सबसे ज़्यादा महिलाओं को रुलाता है, इसलिए साफ़ कहती हूँ: PCOS का मतलब बाँझपन नहीं है। PCOS वाली ज़्यादातर महिलाएँ माँ बनती हैं, कुछ बिना किसी इलाज के और कुछ थोड़ी मदद से।
मुश्किल इसलिए आती है कि अंडा हर महीने भरोसे से नहीं छूटता, इसलिए सही समय पकड़ना कठिन होता है। अच्छी बात यह है कि जो चीज़ें साइकल नियमित करती हैं, वही अंडा छूटने की संभावना भी सुधारती हैं। अगर आप एक साल से कोशिश कर रही हैं, या 35 की उम्र के बाद छह महीने से, तो डॉक्टर से मिलिए और इंतज़ार मत कीजिए।
लंबे समय में क्या ध्यान रखना है
यह हिस्सा डराने के लिए नहीं, तैयार रहने के लिए है। PCOS में टाइप 2 डायबिटीज़, हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल की गड़बड़ी और फ़ैटी लिवर का ख़तरा सामान्य से ज़्यादा रहता है, क्योंकि जड़ में वही इंसुलिन की गड़बड़ी है। और अगर सालों तक पीरियड बिल्कुल न आए, तो बच्चेदानी की परत लगातार मोटी होती रहती है, जिस पर डॉक्टर नज़र रखना चाहते हैं।
अच्छी ख़बर यह है कि जो चीज़ें आपके लक्षण ठीक करती हैं, वही ये ख़तरे भी घटाती हैं। आपको दो अलग योजनाएँ नहीं चाहिए, एक ही योजना दोनों काम करती है। साल में एक बार शुगर, लिपिड और बीपी की जाँच करवा लेना समझदारी है।
वे बातें जो सच नहीं हैं
"शादी और बच्चे के बाद PCOS अपने आप ठीक हो जाता है।" ऐसा नहीं होता। गर्भावस्था के दौरान कुछ लक्षण शांत लग सकते हैं, पर स्थिति बनी रहती है।
"पीरियड लाने की गोली से इलाज हो जाता है।" उससे ब्लीडिंग हो जाती है और कैलेंडर ठीक दिखता है, जबकि अंदर की वजह वैसी की वैसी रहती है। पीरियड्स में देरी: कारण और इलाज में यह विस्तार से लिखा है।
"ओवरी की सिस्ट का ऑपरेशन करवा लो, सब ठीक।" वे सिस्ट हैं ही नहीं, और यह सर्जरी से हल होने वाली स्थिति नहीं है।
"PCOS सिर्फ़ मोटी लड़कियों को होता है।" दुबली महिलाओं को भी होता है, और उनमें अकसर देर से पकड़ में आता है।
"दो महीने में जड़ से ख़त्म कर देंगे।" जो यह कहे, उससे दूरी रखिए। यह स्थिति संभाली जाती है, मिटाई नहीं जाती, और ईमानदार इलाज यही कहता है।
डॉक्टर से कब मिलें
मिलिए अगर आपकी साइकल लगातार 35 दिन से लंबी है या साल में आठ से कम पीरियड आते हैं, अगर तीन महीने से पीरियड नहीं आया, अगर चेहरे पर अनचाहे बाल, ज़िद्दी मुँहासे या बाल पतले होना शुरू हुआ है, अगर वज़न तेज़ी से बढ़ रहा है या गर्दन की त्वचा काली पड़ रही है, या अगर आप गर्भधारण की कोशिश कर रही हैं और सफल नहीं हो रहा।
जल्दी पकड़ लेने का फ़ायदा असली है। PCOS जितनी देर बिना इलाज रहता है, इंसुलिन और वज़न का चक्र उतना गहरा होता जाता है, और उसे मोड़ने में उतनी ही ज़्यादा मेहनत लगती है।
एक बात जो कम लोग जानते हैं
PCOS का इलाज करते हुए ज़्यादातर महिलाएँ तराज़ू पर नज़र रखती हैं। मैं अपने मरीज़ों से कहती हूँ कि पहले तीन महीने तराज़ू को थोड़ा भूल जाइए।
वजह यह है कि जो चीज़ सबसे पहले सुधरती है वह वज़न नहीं होता। पहले मीठे की तलब कम होती है, फिर खाने के बाद की सुस्ती जाती है, फिर नींद गहरी होती है, फिर त्वचा साफ़ होने लगती है। ये सब इस बात के संकेत हैं कि इंसुलिन शांत हो रहा है, और यही असली प्रगति है। साइकल और वज़न उसके पीछे-पीछे आते हैं, अकसर तीसरे महीने के बाद। जो महिलाएँ इन शुरुआती संकेतों को पहचानना सीख जाती हैं, वे टिकती हैं। जो सिर्फ़ तराज़ू देखती हैं, वे छठे हफ़्ते में हार मान लेती हैं, ठीक तब जब शरीर अंदर से बदलना शुरू ही कर रहा होता है।
आगे क्या पढ़ें
अगर आपकी सबसे बड़ी दिक़्क़त पीरियड का न आना या देर से आना है, तो अनियमित पीरियड्स के घरेलू उपाय और पीरियड्स में देरी: कारण और इलाज से शुरू कीजिए। इस महीने पीरियड मिस हुआ है तो पीरियड मिस होने पर क्या करें पढ़िए। घरेलू नुस्खों की सच्चाई जाननी है तो पीरियड्स जल्दी लाने के घरेलू उपाय, और अगर पीरियड समय से पहले आ रहा है तो समय से पहले पीरियड आने के कारण। आयुर्वेदिक रास्ता पूरा समझना है तो अनियमित पीरियड्स का आयुर्वेदिक इलाज।
जब आपको अपने लिए बना प्लान चाहिए
कोई भी लेख आपकी रिपोर्ट नहीं पढ़ सकता। यह बता सकता है कि PCOS क्या है और क्यों होता है, लेकिन आपके शरीर में जड़ कहाँ है, इंसुलिन, थायरॉइड, वज़न या तनाव, यह जानने के लिए किसी को आपका पूरा इतिहास देखना पड़ता है। Qura में यही होता है। हमारी BAMS आयुर्वेदिक डॉक्टर आपसे 45 मिनट बात करती हैं, आपकी रिपोर्ट देखती हैं, और डाइट, आयुर्वेदिक दवा और नियमित फ़ॉलो-अप को मिलाकर 90 दिन का प्लान बनाती हैं जो जड़ पर काम करे।
हम यह नहीं कहेंगे कि PCOS ठीक हो जाएगा, क्योंकि कोई ईमानदार डॉक्टर यह नहीं कहता। हम यह कर सकते हैं कि आपकी असली वजह ढूँढें और उस पर काम करें।
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यह लेख जानकारी के लिए है और एक BAMS चिकित्सक द्वारा समीक्षित है। यह आपकी व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह की जगह नहीं ले सकता। PCOS के लक्षण दूसरी स्थितियों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए जाँच और इलाज किसी योग्य डॉक्टर की देखरेख में ही कराएँ, ख़ासकर अगर आप गर्भवती हों, स्तनपान करा रही हों, या कोई दवा ले रही हों।
लिखा गया: डॉ. मेघा हल्दिया (BAMS), Qura Nutrition। (लेखिका का परिचय अंग्रेज़ी में है।)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
PCOS क्या है?
PCOS एक हार्मोनल और मेटाबॉलिक स्थिति है जिसमें अंडा हर महीने ठीक से नहीं छूटता, शरीर में पुरुष-प्रकार के हार्मोन (एंड्रोजन) बढ़ जाते हैं, और ज़्यादातर महिलाओं में शरीर पर इंसुलिन का असर कम पड़ता है। सोनोग्राफ़ी में ओवरी पर जो बुलबुले दिखते हैं वे सिस्ट नहीं, अधपके अंडे हैं जो छूट नहीं पाए।
PCOS और PCOD में क्या अंतर है?
PCOD में ओवरी में कई अधपके अंडे जमा होते हैं पर हार्मोनल असंतुलन हल्का रहता है, और यह ज़्यादा आम है। PCOS उससे गहरी स्थिति है जिसमें एंड्रोजन बढ़े होते हैं, इंसुलिन का असर कम होता है और अंडा छूटना लंबे समय तक रुका रहता है। इलाज की दिशा दोनों में एक जैसी है: खानपान, वज़न, नींद और ज़रूरत पर दवा।
PCOS के मुख्य लक्षण क्या हैं?
सबसे आम हैं अनियमित या देर से पीरियड, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल, ज़िद्दी मुँहासे, सिर के बाल पतले होना, कमर के आसपास वज़न बढ़ना, गर्दन या बग़ल की त्वचा का काला पड़ना, मीठे की तेज़ तलब, और गर्भधारण में मुश्किल। सारे लक्षण एक साथ होना ज़रूरी नहीं, और दुबली महिलाओं को भी PCOS होता है।
PCOS क्यों होता है?
ज़्यादातर मामलों में जड़ इंसुलिन रेज़िस्टेंस है। शरीर पर इंसुलिन का असर कम पड़ता है, पैंक्रियास ज़्यादा इंसुलिन बनाता है, और बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी से एंड्रोजन बनवाता है। बढ़े हुए एंड्रोजन अंडे को पककर छूटने नहीं देते। इसमें आनुवंशिकता, वज़न, नींद और तनाव सबकी भूमिका होती है।
PCOS की जाँच कैसे होती है?
कोई एक जाँच नहीं होती। डॉक्टर तीन में से कम से कम दो चीज़ें देखते हैं: अनियमित अंडा छूटना, बढ़े हुए एंड्रोजन, और सोनोग्राफ़ी में ओवरी की ख़ास तस्वीर। आमतौर पर TSH, प्रोलैक्टिन, टेस्टोस्टेरोन, LH और FSH, ख़ाली पेट इंसुलिन और शुगर या HOMA-IR, विटामिन D, हीमोग्लोबिन और फ़ेरिटिन तथा पेल्विक सोनोग्राफ़ी करवाई जाती है।
क्या PCOS पूरी तरह ठीक हो सकता है?
नहीं, और कोई ईमानदार डॉक्टर ऐसा दावा नहीं करेगा। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे जीवनभर संभालना पड़ता है। पर यह भी सच है कि सही खानपान, नियमित हरकत, अच्छी नींद और ज़रूरत पर इलाज से लक्षण काफ़ी हद तक ठीक हो जाते हैं, साइकल नियमित हो सकती है और गर्भधारण भी संभव होता है।
PCOS में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?
हर खाने में प्रोटीन (दाल, छोले, पनीर, दही, अंडा, मछली) और फ़ाइबर वाली सब्ज़ी रखें, रोज़ एक चम्मच पिसी अलसी और चौथाई से आधा चम्मच दालचीनी लें, और खाने के बाद टहलें। मैदा, चीनी, मीठे पेय, बहुत तला हुआ और बार-बार चरना कम करें। नाश्ता न छोड़ें और रात का खाना जल्दी तथा हल्का रखें।
क्या PCOS में गर्भधारण हो सकता है?
हाँ। PCOS का मतलब बाँझपन नहीं है और ज़्यादातर महिलाएँ माँ बनती हैं, कुछ बिना इलाज के और कुछ थोड़ी मदद से। मुश्किल इसलिए आती है कि अंडा हर महीने भरोसे से नहीं छूटता। जो बदलाव साइकल नियमित करते हैं वही अंडा छूटने की संभावना भी सुधारते हैं। एक साल से कोशिश कर रही हैं (35 के बाद छह महीने से) तो डॉक्टर से मिलिए।
PCOS का इलाज कितने समय में असर दिखाता है?
आमतौर पर तीन से छह महीने, क्योंकि एक अंडा तैयार होने में ही करीब तीन महीने लगते हैं। पर पहले जो बदलता है वह साइकल नहीं होता: मीठे की तलब कम होना, खाने के बाद की सुस्ती घटना, नींद बेहतर होना और त्वचा साफ़ होना पहले दिखते हैं, और ये अच्छे संकेत हैं।
क्या PCOS शादी या बच्चे के बाद अपने आप ठीक हो जाता है?
नहीं, यह एक आम ग़लतफ़हमी है। गर्भावस्था के दौरान कुछ लक्षण शांत लग सकते हैं क्योंकि साइकल वैसे भी रुकी होती है, पर स्थिति बनी रहती है और बाद में लौट आती है। इलाज की ज़रूरत शादी या बच्चे से नहीं, आपके लक्षणों और रिपोर्ट से तय होती है।
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समय से पहले पीरियड आने के 10 कारण: कब सामान्य है और कब जाँच ज़रूरी है
पीरियड समय से पहले क्यों आ जाता है? तनाव, थायरॉइड, PCOS, गर्भनिरोधक और पेरीमेनोपॉज़ समेत दस कारण, और वे निशानियाँ जिन पर डॉक्टर से मिलना चाहिए।